श्री सिद्धदाता आश्रम में गुरू पूर्णिमा उत्सव का आयोजन किया गया, जिसमें देश विदेश के सैँकड़ों भक्तों ने स्वामी श्री पुरुशोत्तामाचार्य जी महाराज से आर्शीवाद व प्रसाद ग्रहण किया। इस अवसर पर स्वामी पुरूषोत्तमाचार्य ने अपने गुरू व आश्रम के अधिष्ठाता स्वामी श्री सुदर्शनाचार्य महाराज की समाधि पर जाकर पुष्प चढ़ाए।
देश-विदेश से जुटे भक्तों ने गुरू के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए भजनों पर जमकर ठुमके लगाए। उनमें गुरू जी मानो या न मानो मैं तेरा हो गया, मेरी नैया लगा दो पार, सतगुरू मैं तेरी पतंग आदि अनेक सुमधुर भजन गाए गए।
स्वामी श्री पुरुशोत्तामाचार्य जी ने भक्तों को प्रवचन करते हुए कहा कि गुरू की शिक्षाओं को मानने वाले भक्तों का भगवान भी कुशलक्षेम देखते हैं। उन्होंने कहा कि अंधकार से प्रकाश में ले जाने वाले गुरू का वंदन हर हाल में आवश्यक है। गुरू वास्तव में भक्त के लिए भगवान की अदालत में सक्षम साक्ष्यों के आधार पर वकालत करते हैं। जिससे शिष्य के कष्टों का हरण हो जाता है। इसके बाद हुए प्रवचन कार्यक्रम में स्वामी पुरूषोत्तमाचार्य ने सेवादारों को कर्म और सद्सेवा का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि सेवा तीन प्रकार की होती है। यह तन, मन और धन से हो सकती है। तन से सेवा सर्वोत्तम मानी गई है, मन से सेवा साधारण है लेकिन धन से सेवा भी मानी जाती है।
श्री लक्ष्मी नारायण दिव्या धाम श्री सिध्दाता आश्रम फरीदाबाद में नृसिंह भगवान जयंती बड़ी धूमधाम से मनाई गयी। जगत गुरु स्वामी श्री पुरुशोत्तामाचार्य जी महाराज ने मधु, चन्दन, धूप व गंगा जल से वेद पाठियो द्वारा मन्त्रों के उच्चारण से नृसिंह भगवान का अभिषेक किया। इसके उपरांत नृसिंह भगवान की एक विशाल शोभा यात्रा बैंड बाजों, नगाडो व आतिशबाजी के साथ निकाली गयी। जिसमे हजारों भक्तों ने नृसिंह भगवान के जयकारे लगाये।
जगतगुरु स्वामी श्री पुरुशोत्तामाचार्य जी ने भजन संध्या में आये हजारों भक्तों को अपने सन्देश में कहा की भगवान नारायण ने हिरण्यकशिप के दैत्यराज का अत्याचार समाप्त करने के लिए , देवताओं की प्रार्थना पर भगवान नारायण, नृसिंह रूप में प्रगट हुए। हिरण्यकशिप ने अपने पुत्र प्रह्लाद को भगवान का नाम लेने के कारण तरह तरह के कष्ट दिए लकिन असुर भाव नहीं छोड़ा। प्रह्लाद ने अपने पिता को समझाया की भगवान हर जगह है तो हिरण्यकशिप बोला की अगर भगवान हर जगह है तो इस खम्बे में क्यों नहीं दिखता और क्रोध में आकर खम्बे पर वार किया उसी समय खम्बे से नृसिंह भगवान प्रगट हुए उनका आधा शरीर सिंह का था और आधा मानव का ,और क्षण भर में ही नृसिंह भगवान ने हिरण्यकशिप की जीवन लीला समाप्त कर दी, भगवान ने प्रहलाद को मनोवांछित वरदान मांगने को कहा ,प्रहलाद बोले मुझे यही वरदान दो की मुझे कभी कोई इच्छा न हो नृसिंह भगवान ने तथास्तु कहकर प्रह्लाद को गोद में उठा लिया अंत में गुरुमहाराज जी ने कहा कि प्रह्लाद कि तरह कोई इच्छा न रखते हुए भगवान का नाम और इश्वर भक्ति ही मोक्ष का द्वार है।
Shri Majjagadguru Ramanujacharya Indraprasth Haryana Peethadeeshwar
Swami Purshottamacharya Ji Maharaj
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Narayan Dhun
Notice Board
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।66।।
‘सम्पूर्ण धर्मों के आश्रयका त्याग करके मेरी शरण में आ जा। मैं
तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत कर।’
- जय गुरु देव
भक्तजनों के हितार्थ सूचना
सभी भक्तजनों को हम सप्रेम सूचित करना चाहते हैं कि प्रत्येक मंगलवार
एंव शनिवार की सायंकालीन आरती के उपरांत श्रीमद् जगद् गुरु रामानुचार्य
स्वामी श्री पुरुषोत्तमाचार्य जी महाराज ‘आचार्यश्री’ के कर कमलों
से आशीर्वाद एवं प्रसाद पाने का मौका आपको प्राप्त हो रहा है, कृपया
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