Sri Dev Darbaar

Guru Jis Video Satsang on Guru Purnima

Swami Purushottamacharya Ji Maharaj’s Satsang on Guru Purnima – 14th July 2011

Swami Purushottamacharya Ji Maharaj’s Satsang on Guru Purnima – 15th July 2011 (PART -1)

Swami Purushottamacharya Ji Maharaj’s Satsang on Guru Purnima – 15th July 2011 (PART -2)

Swami Purushottamacharya Ji Maharaj’s Satsang on Guru Purnima – 16th July 2011 (PART -2)

Swami Purushottamacharya Ji Maharaj’s Satsang on Guru Purnima – 16th July 2011 (PART -2)

तीन दिवसीय गुरू पूर्णिमा उत्सव सम्पन्न

श्री सिद्धदाता आश्रम में गुरू पूर्णिमा उत्सव का आयोजन किया गया, जिसमें देश विदेश के सैँकड़ों भक्तों ने स्वामी श्री पुरुशोत्तामाचार्य जी महाराज से आर्शीवाद व प्रसाद ग्रहण किया। इस अवसर पर स्वामी पुरूषोत्तमाचार्य ने अपने गुरू व आश्रम के अधिष्ठाता स्वामी श्री सुदर्शनाचार्य महाराज की समाधि पर जाकर पुष्प चढ़ाए।

देश-विदेश से जुटे भक्तों ने गुरू के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए भजनों पर जमकर ठुमके लगाए। उनमें गुरू जी मानो या न मानो मैं तेरा हो गया, मेरी नैया लगा दो पार, सतगुरू मैं तेरी पतंग आदि अनेक सुमधुर भजन गाए गए।

स्वामी श्री पुरुशोत्तामाचार्य जी ने भक्तों को प्रवचन करते हुए कहा कि गुरू की शिक्षाओं को मानने वाले भक्तों का भगवान भी कुशलक्षेम देखते हैं। उन्होंने कहा कि अंधकार से प्रकाश में ले जाने वाले गुरू का वंदन हर हाल में आवश्यक है। गुरू वास्तव में भक्त के लिए भगवान की अदालत में सक्षम साक्ष्यों के आधार पर वकालत करते हैं। जिससे शिष्य के कष्टों का हरण हो जाता है। इसके बाद हुए प्रवचन कार्यक्रम में स्वामी पुरूषोत्तमाचार्य ने सेवादारों को कर्म और सद्सेवा का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि सेवा तीन प्रकार की होती है। यह तन, मन और धन से हो सकती है। तन से सेवा सर्वोत्तम मानी गई है, मन से सेवा साधारण है लेकिन धन से सेवा भी मानी जाती है।

Swami Purushottamacharyaji Maharaj Satsang – 27th May 2011

Shri Narsingh Jayanti Celebrated on 16th May 2011

श्री लक्ष्मी नारायण दिव्या धाम श्री सिध्दाता आश्रम फरीदाबाद में नृसिंह भगवान जयंती बड़ी धूमधाम से मनाई गयी। जगत गुरु स्वामी श्री पुरुशोत्तामाचार्य जी महाराज ने मधु, चन्दन, धूप व गंगा जल से वेद पाठियो द्वारा मन्त्रों के उच्चारण से नृसिंह भगवान का अभिषेक किया। इसके उपरांत नृसिंह भगवान की एक विशाल शोभा यात्रा बैंड बाजों, नगाडो व आतिशबाजी के साथ निकाली गयी। जिसमे हजारों भक्तों ने नृसिंह भगवान के जयकारे लगाये।

जगतगुरु स्वामी श्री पुरुशोत्तामाचार्य जी ने भजन संध्या में आये हजारों भक्तों को अपने सन्देश में कहा की भगवान नारायण ने हिरण्यकशिप के दैत्यराज का अत्याचार समाप्त करने के लिए , देवताओं की प्रार्थना पर भगवान नारायण, नृसिंह रूप में प्रगट हुए। हिरण्यकशिप ने अपने पुत्र प्रह्लाद को भगवान का नाम लेने के कारण तरह तरह के कष्ट दिए लकिन असुर भाव नहीं छोड़ा। प्रह्लाद ने अपने पिता को समझाया की भगवान हर जगह है तो हिरण्यकशिप बोला की अगर भगवान हर जगह है तो इस खम्बे में क्यों नहीं दिखता और क्रोध में आकर खम्बे पर वार किया उसी समय खम्बे से नृसिंह भगवान प्रगट हुए उनका आधा शरीर सिंह का था और आधा मानव का ,और क्षण भर में ही नृसिंह भगवान ने हिरण्यकशिप की जीवन लीला समाप्त कर दी, भगवान ने प्रहलाद को मनोवांछित वरदान मांगने को कहा ,प्रहलाद बोले मुझे यही वरदान दो की मुझे कभी कोई इच्छा न हो नृसिंह भगवान ने तथास्तु कहकर प्रह्लाद को गोद में उठा लिया अंत में गुरुमहाराज जी ने कहा कि प्रह्लाद कि तरह कोई इच्छा न रखते हुए भगवान का नाम और इश्वर भक्ति ही मोक्ष का द्वार है।

जय गुरु देव

जय लक्ष्मीनर्सिंग भगवान

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