Sri Dev Darbaar

सच्चे गुरु की आवश्यकता

गुरु परम्परा अनादि काल से चली आ रही है । जीव मात्र को कंटकाकीर्ण मार्ग पर सही दिशा की ओर अग्रसर होने के लिए पथ-प्रदर्शन का कार्य गुरु ही करते हैं । बङे-बङे ऋषि-मुनि, संत, महात्मा भी बिना सद् गुरु के उन ऊंचाईयों को नहीं छू सकते । गुरु की आवश्यकता और महत्व को स्वामी विवेकानन्द ने भी रेखाकिंत किया है ।

प्रत्येक जीवात्मा का पूर्णत्व प्राप्त कर लेना बिल्कुल निश्चित है और अंत में सभी इस पूर्णावस्था की प्राप्ति कर लेंगे । हम वर्तमान जीवन में जो कुछ हैं, वह हमारे पूर्व जीवन के कर्मों और विचारों का फल है, और हम जो कुछ भविष्य में होंगे वह हमारे अभी के कर्मों और विचारों का फल होगा । हम स्वयं ही अपना भाग्य निर्माण कर रहे हैं, इससे यह न समझ बैठना चाहिए कि हमें किसी बाहरी सहायता की आवश्यकता नहीं, बल्कि अधिकतर स्थलों में तो इस प्रकार की सहायता नितांत आवश्यक होती है । जब ऐसी सहायता प्राप्त होती है तो आत्मा की उच्चतर शक्तियों और आपाततः अव्यक्त प्रतीत होने वाले भाव विकसित हो उठते हैं, आध्यात्मिक जीवन जाग्रत हो जाता है उसकी उन्नति वेगवान हो जाती है और अन्त में साधक पवित्र और सिद्ध हो जाता है ।

यह संजीवनी-शक्ति पुस्तकों से नहीं मिल सकती । इस शक्ति की प्राप्ति तो एक आत्मा दूसरी आत्मा से ही कर सकती है, अन्य किसी से नहीं । हम भले ही सारा जीवन पुस्तकों का अध्ययन करते रहें और बङे बुद्धिजीवी हो जायें पर अंत में हम देखेंगे कि हमारी तनिक भी आध्यात्मिक उन्नति नहीं हुई है । यह बात सत्य नहीं कि बौद्धिक उन्नति के साथ-साथ आध्यात्मिक मार्ग में सहायता मिल रही है पर यदि हम ऐसे अध्ययन से अपने में होने वाले फल का विश्लेषण करें तो देखेंगे
; कि उससे अधिक से अधिक हमारी बुद्धि को ही कुछ लाभ होता है, हमारी अंतरात्मा को नहीं।

Shri Majjagadguru Ramanujacharya Indraprasth Haryana Peethadeeshwar Swami Sudershanacharya Ji Maharajपुस्तकों का अध्ययन हमारे आध्यात्मिक विकास के लिए पर्याप्त नहीं है । यही कारण है कि यधपि हममें से लगभग सभी आध्यात्मिक विषयों पर बङी पाण्डित्यपूर्ण बातें कर सकते हैं, पर जब उन बातों को कार्य रुप में परिणत कर यथार्थ आध्यात्मिक जीवन बिताने का अवसर आता है, तो हम अपने को सर्वथा अयोग्य पाते हैं । जीवात्मा की शक्ति को जाग्रत करने के लिए किसी दूसरी आत्मा से ही शक्ति का संचार होना चाहिए।

जिस व्यक्ति की आत्मा से दूसरी आत्मा में शक्ति का संचार होता है वह गुरु कहलाता है और जिसकी आत्मा में यह शक्ति संचारित होती है उसे शिष्य कहते हैं । किसी भी आत्मा में इस प्रकार शक्ति संचार करने के लिए पहले तो उसमें स्वयं इस संचार की शक्ति विधमान रहे और दूसरे जिस आत्मा में यह शक्ति संचारित की जाए वह इसे ग्रहण करने योग्य हो । बीज भी उम्दा और सजीव रहे एवं जमीन भी अच्छी जोती हुई हो और जब ये दोनों बातें मिल जाती हैं तो प्रकृति धर्म की अपूर्व योग्यता होनी चाहिए, और उसके शिष्य को भी कुशल होना चाहिए । जब दोनों ही अद्भुत और असाधारण होते हैं, तभी अद्भुत आध्यात्मिक जाग्रति होती है अन्यथा नहीं । ऐसे ही पुरुष वास्तव में सच्चे गुरु होते हैं और ऐसे ही शिष्य आदर्श शिष्य या आदर्श साधक कहे जाते हैं । अन्य सब लोगों के लिए तो आध्यात्मिक बस एक खिलवाङ है । उनसे बस थोङा सा एक कौतूहल भर उत्पन्न हो गया है, बस थोङी सी बौद्धक स्पृहा भर जग गयी है, पर वे अभी धर्म क्षितिज की बाहरी सीमा पर ही खङे हैं ।

इसमें संदेह नहीं कि इसका भी कुछ समय बाद यही भाव सच्च
ी धर्म-पिपासा में परिवर्तित हो जाए और यह भी प्रकृति का एक बङा अद्भुत नियम है कि ज्यों ही भूमि तैयार हो जाती है त्यों ही बीज को आना चाहिए और वह आता भी है । ज्यों ही आत्मा की धर्म पिपासा प्रबल होती है त्यों ही धर्म शक्ति संचारक पुरुष को उस आत्मा की सहायता के लिए आना ही चाहिए और वे सद् गुरु आते भी हैं । जब ग्रहीत की आत्मा में धर्म प्रकाश की आकर्षण- शक्ति पूर्ण और प्रबल हो जाती है तो इस आकर्षण से आकृष्ट प्रकाशदामिनी शक्ति स्वयं ही आ जाती है । परन्तु इस मार्ग में कुछ खतरे भी हैं । उदाहरणार्थ इस बात का डर है कि ग्रहीता-आत्मा क्षणिक भावुकता को कहीं वास्तविक धर्म पिपासा न समझ बैठें । फिर, शक्ति संचारक गुरु के संबंध में तो और भी बङे-बङे खतरों की संभावना है । बहुत लोग ऐसे होते हैं, जो स्वयं होते तो बङे अज्ञानी हैं, परन्तु फिर भी अहंकारवश अपने को सर्वज्ञ समझते हैं । इतना ही नहीं बल्कि दूसरों को भी अपने कंधों पर ले जाने को तैयार रहते हैं । इस प्रकार अंधा-अंधे का अगुआ बनकर दोनों ही गड्ढे में गिर पङते हैं । अज्ञान से धिरे हुए अत्यंत निर्बुद्ध होने पर भी अपने को महापण्डित समझने वाले मूढ़ व्यक्ति, अंधे के नेतृत्व में चलने वाले अंधों के समान चारों ओर ठोंकरे खाते हुए भटकते हैं । संसार तो ऐसे लोगों से भरा पङा है । हर एक आदमी गुरु होना चाहता है । एक भिखारी भी चाहता है कि वह लाखों का दान कर डाले । जैसे हास्यस्पद स्थिति में भिखारी है वैसे ही ये स्वंभू गुरु भी ।

भाग्यशाली हैं हम सभी जिन्हें प्रभु कृपा से सद् गुरु देव की प्राप्ति स्वामी सुदर्शनाचार्य जी महाराज के रुप में हुई है । दायित्व हम
; पर है कि हम अपने आप को सद्-शिष्य, सुपात्र सिद्ध करें जिससे गुरु देव अपनी दिव्य शक्ति की किरणें हमारे अंदर प्रवाहित कर सकें ।

Guru Ji’s Satsang on Navratri and Importance of Yagna

मेरे प्रेमियों, आज नवरात्र की आखिरी रात्रि है और कल दशहरा है । आज यहाँ जो सामूहिक यज्ञ हो रहा है इसका बङा महत्व है । आप लोग यहाँ तक बङे कष्ट उठाकर आये होंगे, यहां जमीन पर बैठने में भी कष्ट हो रहा होगा । लेकिन मेरे प्रेमियों, आप जब इस यज्ञ के महत्व को जानेंगे तो इस कष्ट को भूल जायेंगे । जो इस यज्ञ में शामिल हुए हैं उनके ऊपर जो भी व्याधाएं होंगी वे स्वयं दूर हो जायेंगी और वह धन-धान्य से समृद्ध होगा । उसके पास किसी प्रकार की कमी नहीं रहेगी ।

मेरे प्रेमियों, यजुर्वेद के अन्दर यज्ञ का प्रमाण मिलता है । वह परब्रह्म परमात्मा यज्ञ स्वरुप है इसी के द्वारा देवताओं का आह्वान किया जाता है, देवताओं को बुलाया जाता है यही हमारा प्रथम धर्म है ।

yagna.JPGमेरे प्रेमियों, गीता में भगवान कृष्ण ने अर्जुन से कहा है – यज्ञ से आकाश का वायुमण्डल शुद्ध होता है और वायुमण्डल के विशुद्ध होने पर बादल आच्छादित होते हैं उससे वर्षा होती है । उस वर्षा के बिना इस भूमंडल पर अन्न पैदा नहीं होगा । यज्ञ हमें शान्ति देते हैं, विश्व को शान्ति देते हैं । इसलिए गुरुजन आश्रम में यज्ञ करते है । प्रेमियों को बुलाकर यज्ञ करते हैं ताकि अनन्य प्रकार के उरद्रव, अन्नय प्रकार के ग्रह दूर होकर हमें शान्ति प्रदान करें ।

मेरे प्रेमियों, यज्ञ में जो स्वस्ती वाचन होता है उसमें मंत्रोद्वारा 33 करोङ देवी देवताओं के राजा इन्द्र का आह्वान किया जाता है, हे इन्द्र आप इस यज्ञ के मण्डप में आयें और यज्ञ आहुतियों को स्वीकार करें । स्वीकार करके हमारा कल्याण करें । केवल कल्याण से गुजारा नहीं हो सकता, इसलिए हमारे, जितने भी कार्य हैं, जितने भी व्यापार हैं, दैनिक र
79;जी रोटी के जितने भी साधन हैं, उन्हें बढ़ाये । उनमें बरकत डालें ।

मेरे प्रेमियों, हमारे शरीर में 72 करोङ रोमांच हैं । उनके उतने ही देवता हैं । उन सबका आह्वान किया जाता है । वे सब आकर उनकी रक्षा करें।

कहा जाता है कि वेद चार हैं, लेकिन मेरा मानना है कि वेद चार नहीं पांच हैं- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद और पांचवा वेद है आयुर्वेद । जब शरीर बीमार रहेगा तो धर्म का कार्य कौन करेगा । इसलिए पांचवा वेद आयुर्वेद हमारी रक्षा करे । मेरे प्रेमियों, ब्रहस्पति राजा इन्द्र के गुरु हैं । ब्रहस्पति वेदों के प्रवता है । वे वेदों द्वारा सभी क्लेशों को दूर करते है । वे ब्रहस्पति देव भी हमारी रक्षा करें ।

अग्नि प्रधान देवता है अग्नि के बिना शरीर नहीं चल सकता । अन्न सुपाच्च नहीं हो सकता । अग्नि से हमारा रक्त संचार होता है । इससे रस बनता है । अग्नि के तेज के बिना भौतिक वाद का तेज नहीं रहता है । इसलिए अग्नि देवता का आह्वान करते हैं ।

मेरे प्रेमियों, शान्ति के बिना यदि अटूट धन है, अतुल बल है, अतुल सौन्दर्य है तो इनका कोई अस्तित्व नहीं होता है और जब शान्ति का धन मिले और इनमें से कोई न भी हो तो वह चित से परमात्मा की और चल देता है ।

आप, हम सब जो यहां बैठे हुए हैं सभी देवताओं के अधीन है । पूरा संसार देवताओं के आधीन है । शास्त्रों में कहा गया है- देवाधीनम् जगत सर्वम, मन्त्राधीनम् चः देवता, ते मंत्रा गुरुआधीनम् तस्मैय श्री गुरुवे नमः ये सारा जगत देवताओं के आधीन है, देवता मंत्रों के अधीन हैं और मंत्र गुरु के अधीन है ।

मेरे प्रेमियों कुछ लोग कहते हैं कि ये गुरु तो बरगलाते हैं । झूठ बोलते है । यह गलत है ।

प्रमाण के लिए कुन्ती ने सूर्य देवता का आह्
357;ान किया । सूर्य कर्ण रुप में बेटा बनकर पैदा हुए । इसी तरह से यमराज का आह्वान किया वह भीम बनकर आ गया । इन्द्र का आह्वान किया, अर्जुन बनकर आ गया, अश्विनी कुमारों का आह्वान किया तो नकुल और सहदेव बनकर आ गये । मंत्रों की ताकत देखिये कि देवों को बेटा बनकर आना पङा ।

मेरे प्रेमियों, यज्ञ की प्रधानता धर्म है । यह धर्म अर्थ काम और मोक्ष को देता है । अर्थ का मतलब धन होता है । धन रुपया पैसा ही नहीं है । धन बहुत प्रकार का होता हैं पुत्र रत्न भी धन हैं जब दशरथ के संतान नहीं हुई तो वे अपने गुरुवशिष्ठ के पास गये । गुरु ने कहा कि हे राजन मैं अभी अपनी दिव्य दृष्टि से देखता हूँ कि आपके यहां संतान का योग है या नहीं । उन्होंने फिर और ध्यान से दूर तक देखा और कहा- हे राजन एक श्रंगी ऋषि हैं । वे तुम्हें यज्ञ करा दें तो तुम्हें पुत्र रत्न हो सकता है । दशरथ गुरु वशिष्ट के साथ श्रंगी ऋषि के पास गये । उन्होंने यज्ञ किया । उस यज्ञ का नाम था पुत्रदा यज्ञ इस यज्ञ से राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुधन हुए । हनुमान जी का जन्म भी इसी यज्ञ से हुआ है ।

मेरे प्रेमियों, यज्ञ पुत्र प्राप्ति के लिए भी होता है, यज्ञ विजय के लिए भी होता है, यज्ञ शांति के लिए भी होता है, यज्ञ धर्म के लिए ही नहीं काम साधना के लिए भी होता है । यज्ञ से हम गृहों का आह्वान भी करते हैं । नौ ग्रहों की आहुति देते हैं । नौ ग्रहों का हम से बहुत निकट का संबंध है । जब बच्चे का जन्म होता है तब वे ग्रह आकाश में होते हैं उनका प्रभाव पङता है । उन नौ ग्रह में जो सूर्य है वे ओज देते है । कुछ लोग कहते हैं कि मैं बहुत भलाई करता हूँ लेकिन यश नहीं मिलता । इसका मतलब हुआ कि उसका सूर्य कमजोर है, सूर्य यश देता है, हमारे अंदर जो ओज होता ह&#
2376; वह सूर्य की वजह से है । तेज, बल यश सूर्य देता है और उस सूर्य का आह्वान हम यज्ञ के बिना नहीं कर पाते हैं । आकाश में जो चंद्रमा ग्रह है यह हमें शांति देने की ताकत है । यह रात में अमृत भी छोङता है । हमारे शरीर में आंखों की ज्योति को बढ़ाता है । दिल, मन का अधीपति चन्द्रमा हैं जिसका चंद्रमा कमजोर होता है उसे दिल की बिमारियाँ शुरु हो जाती है तो यज्ञ में हम चंद्रमा का आह्वान इसलिए करते हैं कि ये सारी बीमारियाँ दूर हो जायें । और यह केवल कहना नहीं है मेरे प्रेमियों यह प्रेक्टीकल इस शरीर का किया हुआ है । डाक्टरों ने कह दिया था कि आपका हार्ट डैमेज हो गया । हमने कह दिया कि कल देखेंगे आज नहीं । बत्रा अस्पताल में हाल ही की बात है दूसरे दिन जब अस्पताल गया तो डाक्टर बोले कि यह तो नया बन गया । हमने कहा कि नया कैसे बन गया तो डाक्टर बोले हमें पता नहीं । लेकिन यह नया बन गया सच है । इसमें कोई डैमेज नहीं है केवल एक नली ब्लाक हैं हुआ यूं कि हमने घर आकर चंद्रमा का आह्वान किया कि हे चंद्रमा, यह तू क्या कर रहा है । चंद्रमा हमारे हार्ट की रक्षा करता है हमें शांति देता है ।

इसके बाद हम मंगल का आह्वान करते हैं । मंगल यानि भूमि पुत्र का । मंगल नाम कल्याण का है । मंगल जब कृपा करते हैं तो पृथ्वी के गर्भ से हमें वस्तुएं मिलती हैं । मानव को पृथ्वी की वस्तुओं का लाभ मिलना शुरु हो जाता है हम जितनी सुप्रतिज्ञाये करते है वे सब मंगल के द्वारा होती है । आप जंगल में आये हैं । मंगल नाम आनन्द का भी हैं कल्याण कार्य की और गमन मंगल कराता है हमारे शरीर में मंगल का स्थान रक्त पर है । मंगल का आह्वान किया जायेगा । तो ब्लड संबंधी विकार दूर हो जाते हैं । इसके बाद बुध का आह्वान करते &#
2361;ैं यह मस्तिष्क का मालिक है । मस्तिष्क जैसा होगा वैसा हमारा शरीर चलता है । हमारे दिमाग में तीन वृति है राजसी, तामसिक व सात्विक । यज्ञ में हम प्रार्थना करते है हमें सद् बुद्धि दे ।

इसके बाद वृहस्पति का आह्वान किया जाता है । जिसका वृहस्पति बलवान होता है उसके चेहरे पर ओज हो जाता हैं तो हम वृहस्पति का आह्वान करें ।

शुक्र का आह्वान इसलिए करते है कि शुक्र नाम ताकत का है । वीर्य का है अन्न से रस, रस से रक्त । रक्त से वीर्य उसका अधिकारी शुक्र है इसलिए हम लोग शुक्र का आह्वान करते है । शनि क्रोधी ग्रह है इसने राम को नहीं बक्शा महलों से जंगल में फेंक दिया । राजा हरिश्चंद्र की ड्यूटी मरघटे में लगवा दी । रावण की लंका में आग लगवा दी । जब शनि प्रसन्न होता है तो जमीन पर पङे को महल में बैठा देता है ।

इसी तरह यज्ञ में राहू व केतू का भी आह्वान करते है । हालांकि ये राक्षस हैं । हम इनका इसलिए आह्वान करते हैं ताकि ये हमारी रक्षा कर सके जब मानव की विपरीत बुद्धि होती है तो केतू मानव को स्वजन बान्धवों से दूर कर देता है ।

अब यह शंका उठती है कि यहां दी गयी आहुति वहां कैसे पहुंच जाती है । मेरे प्रमियों भाव है तो जरुर पहुँचती है और भाव के अलावा दो देवी हैं, एक का नाम स्वाहा है । इसका काम है इस आहुति को वहां पहुँचाना, दूसरी सवधा है ।

यज्ञ का हमारे जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है । इससे धर्म की, धन की प्राप्ति, एश्वर्य की प्राप्ति, संतान की प्राप्ति होती है, ये सब यज्ञ प्रदान कर देता है ये तो यज्ञ के धार्मिक आध्यात्मिक लाभ है । यहां के यज्ञ की सामग्री में तिल, चावल, पंच मेवा, पंच मीठा, घी हैं । आयें सब इसकी आहुती दें । इससे श्वास के द्वारा जो गंध जाती ह&
#2376; तो हमारा अंतर शुद्ध होता है ।

इससे वायुमण्डल तो शुद्ध होता ही है, शरीर भी स्वस्थ होता है उसमें भगवान की ओर ध्यान लगता है । मेरे प्रमियों, इस संसार में सारा खेल चित्त का है । चित्त का सारथी मन होता है । आत्म तत्व शुद्ध होता है यज्ञ से । जब चित्त मन आत्मा शुद्ध हो गये तो फिर क्या रह गया ।

यह समारोह इसलिए यहां होता है क्योंकि धुएं से स्पर्श का, यज्ञ के दर्शन का भी लाभ है, यज्ञ में आहुति तक लाभ ही लाभ है । नवरात्रों में आज की रात भी शामिल है । आठ रातें निकल चुकी है । इनमें तीन दिन-रात महाकाली के होते हैं । तीन दिन-रात महालक्ष्मी के होते हैं और तीन दिन-रात महा सरस्वती के होते हैं । वैसे प्रत्येक दिन में एक दिन शैलपुत्री रहती है, एक दिन ब्रह्मचारिणी रहती है, तीसरे दिन चन्द्रघंटा रहती है, चौथे दिन पुष्पान्डा रहती है पाचवें दिन स्कन्धमाता रहती है, छटे दिन कात्यानी नाम की देवी रहती है सातवें दिन कालरात्रि नाम की देवी रहती है आठवे दिन महागौरी रहती है नवा दिन सिद्धिदात्री देवी का है जो आज है इसलिए सिद्धलोग, आचार्य लोग, गुरुजन दशहरे से पहले दिन यानि सिद्धिदात्री के दिन समारोह करते हैं । मेरे प्रेमियों, जब मंत्रों में ताकत है, गुरुओं में ताकत है इन मंत्रों पर जिसका अधिकार हो जाता है ये मंत्र जिसके अधीन हो जाते है जिसकी शरण में आ जाते है उन मंत्रों के देवता उस गुरु को स्वीकार कर लेते हैं । उसे आशीवाद दे देते है वही गुरु है उसी में गुरु तत्व आ जाता है । उस सिद्धिदात्री का आह्वान इस क्षेत्र में मेरे प्रेमियों किया जा रहा है । मारकन्डे ऋषि कहते है कि सिद्धदात्री के आह्वान करने पर, इसके समारोह में भाग लेने पर बङी से बङी बाधा दूर हो जा
40;ी है । दरिद्रता भी दूर हो जाती है मार्ग में भी यह रक्षा करती है रास्ते में संकट आने पर उसे याद करते ही दूर हो जाता है । वह व्यत्ति दिल में जो धारण कर लेता है वह जरुर पूरा होता है इसमें शंका नहीं है । मेरे प्रेमियों कुछ लोग कहते हैं कि हम तो माई का स्मरण करते-करते थक गये मगर वह नहीं सुन रही । तो प्रेमियों जब तक प्रार्थना पत्र पर मुहर नहीं लगती तब तक वह मान्य नहीं होता । गुरुओं की वाणी की जब तक मुहर नहीं लगती तब तक यह नहीं सुनती चाहे आप जिन्दगी भर जागरण करते-करते मर क्यों न जाओ । दूसरे इसका प्रभाव होता जरुर है । बात कमती-बढ़ती की तो हो सकती है । मेरे प्रेमियों यह खेल है श्रद्धा और भाव का जिसमें जितनी श्रद्धा और भाव होगा उसे उतना जरुर मिलेगा ।

सांसारिक कष्ट उठाकर आप यहां आये है । ऐसे कष्ट मिलते रहें तो अच्छा है । धर्म की राह पर चलने में अनेक परेशानी आती है । कभी-कभी आत्मबल भी टूटने लगता है । यह कष्ट होता रहे उसमें दुख नहीं है । इसका फैसला तो धर्मराज करेगा कि धर्म की राह चलने वाले को बाद में कितना आनन्द मिलता है और यहां मौजमस्ती करने वाले को बाद में कितनी परेशानी उठानी पङती है।

नवरात्रों का हमारे जीवन में बहुत ज्यादा महत्व है क्योंकि हमारे जीवन के लिए चार चीजों की जरुरत बहुत होती है धन की जरुरत । धन के बिना गुजारा नहीं चाहे हम गृहस्थी हों, चाहे संन्यासी हों । धन की जरुरत हर समाज के लिए है । बिना धन के धर्म नहीं हो सकता है और बिना धर्म के क्लेश नहीं मिट सकते । कोई भी पाप हो जाता है तो लोग सलाह देते है कि तीर्थ जा । जिसमें पैसा खर्च होता है । मन में कामनाएं होती हैं, वासनाएं होती हैं । उन कामनाओं को पूरा करने के लिए लक्ष्मी की जरुरत ì
1;ोती है और लक्ष्मी उधोग करने से आती है । परिश्रम में बल की जरुरत है बुद्धि की जरुरत है, जिसके पास बुद्धि श्रेष्ठ है वहां बल भी होगा । जहां ये दोनों होंगे वहां लक्ष्मी आ ही जायेगी । धन इकट्ठा हो ही जायेगा । कामनाओं को पूरा करने के लिए शक्ति की जरुरत पङती है । जब तक शक्ति का अनुष्ठान नहीं करेंगे, शक्ति की मान्यता नहीं करेंगे, तब तक हमारे पास न बल होगा, न बुद्धि होगी न धन होगा । यदि वे सब नहीं तो हमारा जीवन निरर्थक है । इन शक्तियों के संचय के लिए हमारे पूर्वजों ने कुछ दिन बनाये जो देवियों के है ।

ज्योति नाम शक्ति का है । और वह ज्योति तीन रुपों में प्रकट हुई । महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती । महाकाली आदिदेव भगवान शिव की सहभागिनी रही । और महालक्ष्मी भगवान विष्णु के साथ रही । सरस्वती स्वतंत्र भी रही और ब्रह्मा की सहभागिनी भी रही । इन देवियों के बिना ये महादेव भी कुछ नहीं कर पाये । अब शक्तियों की प्रधानता देखिये कि इनके बिना भगवान भी कुछ नहीं है । तो ऋषि ने देवियों की कुछ पूजा बनायी मंत्र बनाये इन्हें आह्वान करने के लिए मारकन्डे ऋषि ने अपने मारकन्डे पुराण के अंदर दुर्गा का वर्णन किया है । इस पुराण में दुर्गा सप्तसती के नाम से कुछ अध्याय लिखे है इसका विधान लिखा है ।

महाकाली की उपासना हम इसलिए करते है कि यह हमारे जीवन में शक्ति प्रदान करे । हमारे शत्रुओं का दमन करे । हमारे दो शत्रु सबसे बङे है- आलस्य और क्रोध व्यापार को नष्ट कर देते है । महाकाली की पूजा से इनका नाश होता है जिसमें क्रोध होगा उसका सौन्दर्य भी नष्ट हो जाता है । क्रोधी कभी विजयी नहीं होगा । क्रोधी को यश नहीं मिलेगा ।

दूसरी देवी है महालक्ष्मी उधोग पूरे दि
344; करते रहे और लक्ष्मी दो रोटी के लिए भी नहीं मिली तो धर्म-कर्म कैसे होगें । इसलिए लक्ष्मी भी जरुरी है जो सनातनकाल से लक्ष्मी चली आयी है हम उसी की बात कर रहे है लक्ष्मी के बिना गुजारा नहीं । इसलिए महालक्ष्मी की पूजा जरुरी है कोई कितना बङा पापी है । धर्म-कर्म करने से उसके पाप दूर होते है और धर्म-कर्म के लिए लक्ष्मी की जरुरत होती है ।

तीसरी देवी है महासरस्वती यह बुद्धि की देवी है सरस्वती के आह्वान से सद् बुद्धि से उधोग होता है । मेरे प्रेमियों, इन देवियों की पूजा से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष सभी मिल जाता है । कुछ लोग कहते है कि जब गुरु को स्वीकार कर लिया तो देवी-देवताओं की हमें क्या जरुरत रह गयी । शक्ति की उपासना गुरु को भी करनी पङती है । जब बच्चा जवान हो जाता है तो वह मां बाप की मदद करता है उसी प्रकार आप भी देवी-देवताओं की पूजा करेंगे तो गुरु पर वजन कम पङता है । शास्त्र ऐसा कहते है कि गुरु के अंदर सभी देवी-देवताओं का समन्वय है । फिर भी शक्ति की उपासना सभी को करनी ही चाहिए । कुछ लोग निराहार व्रत करते हैं । ऐसे में गुरु से परामर्श कर लेना चाहिए । यह पहले की बात है ।

पहले 72 दिन तक आदमी बिना अन्न के रह सकता था । लेकिन यदि हम आज उसका अनुकरण करेंगे तो नहीं चल पायेगा । इसलिए इस युग में निराहार नहीं रहना चाहिए । हमारे शरीर में हर शक्ति तीन-तीन हैं इडा, पिंगला और सुष्मना इन तीनों नाङियों की आदि देवी ये तीनों ही हैं । रजोगुण, तमोगुण, सतोगुण, ये तीन गुण हमारे अंदर हैं । लौकिकवाद, भौतिकवाद, तथा आध्यात्मिकवाद तीन वाद हैं । तीनों प्रकार की ये देवियाँ हमारे अंदर ही हैं । हम सिद्धों की भी रक्षा तीनों करती हैं । हमें पूरे नौ दिन व्रत करना चाहिए । यदि नौ
दिन न कर सके तो शुरु और अंत का व्रत कर लें । यदि ये दिन न कर सकें तो यहां इस समय जो यज्ञ में आये हैं इतना ही कर लें । इतने से भी कल्याण हो जायेगा । फिर तो गुरु भी मदद कर देगें ।

इस प्रकार हमें इन तीन देवियों की जरुरत पङी । हमें परमात्मा का कानून नहीं तोङना चाहिए । जिस प्रकार राजकाज के अलग-अलग विभाग बने हैं उसी प्रकार परमात्मा ने भी अलग-अलग देवी देवता बनाए है यदि आपको शक्ति की जरुरत है तो आप महाकाली की पूजा करें । लक्ष्मी की जरुरत है तो महालक्ष्मी की पूजा करें, सद् बुद्धि चाहिए तो महासरस्वती की पूजा करें । कुल देवता भी विभागों के मुख्य हैं इसलिए उनको मानना जरुरी है ।

दूर्गा सप्तशती के अनुसार माँ ने शर्त लगायी है कि उनकी पूजा शरदकाल के नवरात्रों में जरुर करें । पूजा नहीं महापूजा करें । क्योंकि जब बहुत लोग मिलकर पूजा करेंगे तो वह जरुर आयेंगी । एक-दो की पूजा में वह आलस्य कर सकती हैं महापूजा करने वालों की सभी व्याधाएं दूर होती हैं । दैहिक, दैविक और भौतिक बाधाएं फिर नहीं रहती हैं । धन-धान्य से परिपूर्ण कर देती हैं । किसी का घर खाली नहीं रहेगा ।

The Nine Forms of Goddess Durga

The auspicious occasion of Navaratri is the 9 days festival of nights, which is celebrated every year with fervor and tremendous gaiety. The pious festival is devoted to worship of Goddess Durga, resembling valor; Goddess Lakshmi; resembling Wealth and Goddess Saraswati, resembling knowledge.

The nine forms of Goddess Durga namely, Shailaputri, Bharmacharini, Chandra Ghanta, Kushmanda, Skanda Mata, Katyayani, Kaal Ratri (Kali), Maha Gauri (Paarvati) and Siddhidatri are worshipped. It is because of the nine forms of goddess Durga; only these three represent a complete womanhood, with goddess Kumari resembling a child; goddess Paarvati resembling a young girl and goddess Durga symbolizing a matured woman. The first three days of the festival of lights is dedicated to Goddess Durga. During 4th, 5th and 6th day of Navratri, goddess Lakshmi is worshipped. The fifth day which is known as Lalita Panchami, marks the day of goddess Saraswati. On this day, devotees gather and display all literature available in the house, light a lamp or ‘diya’. This is seen as the pious exercise done in name of goddess Saraswati to grant power of knowledge and fame.

ma_durga_sri_siddhdata_ashram.JPGThe 7th, 8th and 9th day of Navratri are wholly devoted to goddess Saraswati. On these days, the devotees pray for spiritual knowledge that renders power and brings awakening of mind. It is believed that while seeking the path of knowledge by invoking goddess Saraswati, a man can easily reach “Moksha” and freedom from “Maya or Earthly Pleasures”. On the eight day of Navratri, yagna (holy fire) is performed by offering Ghee (clarified butter), Kheer (rice pudding) and Sesame seeds to goddess Durga.

Originally, there were five Navaratris in which different form of Shakti (Parvati or Durga) were invoked at different times. However, in the present days, only three Navaratris are celebrated and each of the forms of celebrating them is similar, if not same. The popular most three Navaratris are:

Sharad Navaratri/ Great Navratri/ Navratri is biggest and most popular of three Navaratris and celebrated during winter, Sept-Oct. The Navaratri festival symbolizes slaying of Mahishasura by the goddess Durga. The festival of night is celebrated in Northern India, Eastern India, and Western India.

Vasant Navaratri is celebrated at beginning of summer March- April with much of enthusiasm in Northern India and it marks the celebrations of Vaishno Devi temple in Jammu.

Ashada Navaratri/ Guhya Navaratri is celebrated in July-August. This navaratri festival is important for all Upasakas of Varahi.

The festival of Navaratri is celebrated in different tones and tastes across different parts of India. In North India, Navratris are celebrated by keeping fast days on first day, last day or all nine days. The basic essence of the festival is to invoke all the nine forms of goddess Durga during nine days. These forms affect the human life cycle in one way or the other. The tenth day is the day of jubilation or Vijaya-dasami that symbolizes the destruction of evil by the pious avatar.

Shailputri Brahmcharini Chandraganta Kushmanda Skandmata Kaliratri Mahagouri Sidhidhatri

Guru Ji’s Satsang on Navratri

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