Sri Dev Darbaar

लक्ष्मीनारायण मंदिर स्थापना – नांगलोई, दिल्ली

  

सेवा में ही आपको परम सुख मिलेगा।

गुरू की महिमा वेदों ने, पुराणों ने, स्मृतियों ने गाई है। बाबा नानकदेव जी ने तो बहुत ही सारतत्व में लिखा कि ‘सन्त की महिमा वेद न जाने, जेता सुना तेते बखाने’। सन्त और गुरू की महिमा को वेद भी नहीं जान पाये। जिनको वेद नहीं जान पाये तो सत्संग प्रेमियो! आप और हम विचार करें कि हंम उसे कैसे जान सकते हैं? हम तो केवल मान ही सकते हैं। जानने का प्रयास नहीं करना चाहिए।

बाला मरदाना कहने लगे, बाबा! तुम गुरू की महिमा को कैसे लिखवा रहे हो, जब जानते ही नहीं? उन्होंने कहा-जेता सुना; मैंने सत्संग में, सदग्रन्थों में, सन्तों के द्वारा जितना-जितना सुना, उतना-उतना लिखवा रहा हूं।

सन्त शरण में जो पड़े सो जन उद्दद्धरणहार।
सन्त की निन्दा नानका बहुर बहुर अवतार।।

सन्त के शरणागत हो जाने से ही उद्धार हो जाता है। उसको जानने के चक्कर में हम धर्म से पीछे हटने लग जाते हैं अर्थात् हम अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पाते। सन्तों के श्रीमुख का वचन है; बाबा सुखमणि साहिब में फरमान कर रहे हैं –

पारजात प्रभु हरि के नाऊँ।
कल्पवृक्ष हरि के गुण गाऊँ।

कल्प वृक्ष परमात्मा श्रीहरि का गुणगान करता है और कामधेनु गाय, उसकी कथा, उसका मनन, कीर्तन करती है। तो सन्तों का वाक्य परमात्मा के नाम स्मरण से ज्यादा जुड़ा हुआ है अर्थात उसी को वह बार-बार फरमान करते हैं। सन्तों की वाणी, सन्तों का मार्ग, सन्त का वाक्य ही धर्म है। उनके वाक्यों को पूरा करें और भगवान् श्रीमन् नारायण का कीर्तन करें।

सभी दुखों का निवारण करने के लिए बाबा नानकदेव जी ने भी तो यही कहा है : –

दु:ख भंजन तेरा नामु जी, दु:ख भंजन तेरा नामु।।
आठ पहर आराधीए, पूरन सतिगुर गिआनु।।
जितु घटि वसै पारब्रहमु, सोई सुहावना थाउ।।
जम कंकरू नेड़ि न आवई, रसना हरि गुण गाउ।।
सेवा सुरति न जाणीआ ना जापै आपाधि।।
ओट तेरी जगजीवना, मेरे ठाकुर अगम अगाधि।।
भए क्रिपाल गुसाईऑ, नठे सोग संताप।।
तती वाउ न लागई, सतिगुरि राखे आपि।।
गुरू नाराइणु दयु, गुरू, गुरू सचा सिरजणहारू।।
गुरि तुठै सभ किछु पाइआ, जन नानक सद बलिहार।।

लक्ष्य से अलग न हों, अडिगता से डटे रहें

मेरे प्रेमियो! आप लक्ष्य को स्थाई बना लें। लक्ष्य को स्थाई बनाने का मेरा मतलब यह नहीं कि तुम मुझे ही मान लो, यह नहीं कहता; मैं यह भी नहीं कहता कि राम को ही मान लो; न कहता कि कृष्ण को मान लो। लक्ष्य उसे कहते हैं कि एक जगह पर हम लोग टिक जाएं। जगह-जगह भटकने का नाम लक्ष्य नहीं, उसका नाम है भटकाव और भटकाव में तो मेरे प्रेमियो! निश्चित बात है, टकराव ही होगा। स्वाभाविक है जहां भटकेंगे वहां टक्कर भी लगेगी। एक जगह लक्ष्य बना कर आदमी शांतचित हो जाता है, वहां प्राप्ति ही प्राप्ति है। फिर घर बैठे सब कुछ मिल जाता है।

पहले कई बार बोला है कि हमारे गांव में बहुत पहले आया करते थे, डब्बा लेकर तमाशा दिखाने वाले। उस जमाने में एक मुट्ठी अनाज लेते थे। हमारे नजदीक ही गांव है, वहां के नट थे, अणंगपुरा के हम भी छोटे थे मां से अनाज ले जाते थे। वह ऊपर से घुमाता था और वह बोलता रहता था, ‘‘घर बैठे सारा संसार देखो। यह दिल्ली की कुतुबमीनार देखो, बम्बई का मीना बाजार देखो, यह बाबा नानक साहिब देखो, तुलसी दास को देखो और आखिर में कहता था कि यह बारह मन की धोबन देखो। पैसा फैंको, तमाशा देखो।’’ इसका मतलब है कि संसार के मेलों को धोते धोते थकते जायेंगे। आप भी थक जाओगे, मैं भी थक जाऊंगा। दुनिया भी थक जायेगी। थकान हो जायेगी, मैल को धो-धो कर के।

एक धोबी को आप देखिये। उसके अपने कपड़े बिना प्रैस के होते हैं, न साफ ही होते हैं। और वह दुनिया भर के कपड़ो को धो करके, प्रैस करके, कागज लपेट करके देता है। इसी तरह हम संसारी लक्ष्य बना करके थक जायेंगे। संसार के कर्म विपाक के द्वारा दुनिया का मैल धोते-धोते हम मैले होकर मर जायेंगे। इसलिये घर बैठे पूरा संसार देखो। पर कब देखोगे, मेरे प्रेमियो! जब लक्ष्य एक बन जायेगा। और वह लक्ष्य बन जाने के बाद आप लोगों के लिए उस मालिक का यह नौकर आप लोगों को वायदा करता है, प्रतिज्ञा करता है या अंग्रजी में ऐग्रीमेन्ट लिखता है। और जुबान से जो कहता है यह नौकर, वह लिखे से ज्यादा है। लिखे हुए तो मिट जाते हैं, पर मुहं से निकले शब्द सदा अजर-अमर रहते हैं। तो मेरे प्रेमियो! आपका बहुत-बहुत मंगल हो। आस्था तो आप लोगों में है, विश्वास आप लोगों में है, यह तो निश्चित है। अगर आस्था न हो तो इस जगह में क्यों आएं। अगर विश्वास नहीं हो तो ठिठरती हुई सर्दी में क्यों आयें। हर रोज परिक्रमा में, मैं देखता हूं, लाईन नहीं टूटती। यही करते रहते हैं, गुरू बाबा की जय हो, सिद्धदाता की जय हो ऐसा जयकार होता चला जाता है। तो विश्वास भी है। आस्था भी है। आस्था, विश्वास और सेवा – सेवा भी परम सेवा है।

जिस जगह पर आप बैठे हैं, मेरे प्रेमियो! यह जगह आप लोगों ने ही चार दिन के अन्दर निर्माण की, केवल चार दिन का निर्माण है यह ! मैं कैसे मान लूं कि आप लोगों में श्रद्धा नहीं है; मैं कैसे मान लूं कि आप लोगों में विश्वास नहीं है; मैं कैसे स्वीकार कर लूं कि आप सेवा से पीछे हो। इतना बड़ा निर्माण चार दिन में हो जाना और इस शरीर को उस, बाबा के नौकर को, यह भी मालूम नहीं पड़ता कि यह बन भी गया है और क्या खर्चा है, यह भी मालूम नहीं। इससे यह निश्चित है कि इस जगह से आपका अटूट श्रद्धा है इस जगह से आपका अटूट प्यार है। अटूट विश्वास है इस जगह पर, अटूट श्रद्धा है इस जगह पर, पर लक्ष्य से डगमगा जाते हो। घड़ी की सुई हिल जाती है। कभी बारह के साढ़े बारह और कभी एक ही बजा देती है, तो कभी ग्यारह ही बजा देती है। उससे थोड़े समय हम अपने कार्यक्षेत्र में या प्राप्ति में आगे पीछे हो जाते हैं। जब सब चीजें आपके पास मौजूद हैं, घड़ी आपके पास मौजूद है, अच्छी घड़ी है। घड़ी का मतलब यह शरीर रूपी घड़ी है। अच्छी घड़ी है। अच्छे काम कर रहे हो आप लोग। मेरे प्रेमियो! इस महल का रूप, इस भगवान् के स्थान का नाम महल है, मन्दिर है, गुरूद्वारा है, मस्जिद है, गिरिजा है, सब कुछ न कुछ नाम है और यह कृति जो आप देख रहे हैं, यह दस महीने की है। अरे भाई! वैसे तो तेरह महीने हो गये, पर तीन महीने मे तुमने और-और भी तो काम कर दिये। उसमें दस ही महीने बैठेंगे। यह आप लोगों का ही तो करिश्मा है। आप लोगों की सेवा का बल, शरीर का बल, द्रव्य का बल है। मेरे पास, बाबा जी के पास क्या है? ये सब जीजें आपके पास मौजूद हैं, पर लक्ष्य से मत भटको।

लक्ष्य में भटकाव आ जाने से वह श्रद्धा, वह भाव, वह भक्ति, वह प्यार उसमें सब जगह कमी आ जाती है। चाहे घड़ी सोने की हो और भले ही बेशकीमती डायमण्ड उसमें जड़े हों परन्तु जब घड़ी का बैलेंस बिगड़ जाता है तो चाहे करोड़ रुपये की घड़ी हो, टाइम गलत देने लग जाती है। टाइम के लिए ही घड़ी होती हैं, सोने के लिए नहीं होती। डायमण्ड के लिए नहीं होती। चाहे वह घड़ी दो रुपये की है, चाहे दो करोड़ की है, उसकी कीमत केवल टाइम के लिए है। अगर बीस रुपये की घड़ी समय ठीक देती है तो बहुत अच्छी घड़ी है। इसलिए मेरे प्रेमियो! कहने का भाव यह है कि आप चाहे अरबपति हैं, चाहे खरबपति हैं, चाहे असंख्यपति हैं, चाहे पूरे राष्ट्र के मालिक हैं और चाहे आप मिडिल क्लास के हैं और चाहे दाल-रोटी खाने वाले हैं, यदि आपका लक्ष्य उत्तम है, वही मेरे लिए करोड़ रुपये की घड़ी है। वही मेरे लिए डायमण्ड और हीरे की घड़ी है।

आप अपने लक्ष्य से डगमगायें नहीं। लक्ष्य से डगमगाने के बाद ही घड़ी का बैलेंस सिस्टम टाइम बेटाइम हो जाता है। हारमोनियम का सिस्टम जब बिगड़ जात है तो वह स्वर गलत निकालने लग जाता है। बैलेंस मत बिगड़ने दो। बाकी, मैं अपनी मंगलमय कामनाओं के साथ-साथ मैं आप से कह ही चुका हूं कि मैं ऐग्रीमेंट करता हूं प्रतिज्ञा करता हूं और मैं प्रतिज्ञा (ऐग्रीमेंट) इस पंचभौतिक शरीर से नहीं कर सकता। पंचभौतिक शरीर को तो स्वंय संभालना ही मुश्किल हो रहा है। कभी सरदर्द हो जाता है, कभी पेट दर्द हो जाता है, कभी जुकाम, कभी नजला। इससे मैं ही खुद पीड़ित रहता हूं। परन्तु इस शरीर को संभालने वाला कोई और है जो संसार के अणु-अणु, कण-कण में व्याप्त है। मेरे प्रेमियो! यह अतिश्योक्ति, बड़ाई मैं कुछ नहीं करता हूं। यह तो प्राय: आप लोगों ने देख ही लिया होगा कि जो सामने बोल रहा है वह अणु-अणु, कण-कण में व्याप्त है।

गुरु महाराज ने 30 जनवरी को बहुत से भक्तों को नाम दान दिया

प्रश्न : क्या नाम दान आवश्यक है? कई गुरू लोग माईक पर नाम दान देते हैं। क्या यह शास्त्र संगत हैं?

उत्तर : मेरे प्रेमी नाम दान तो बहुत आवश्यक है। जब बच्चे का जन्म होता है तब मां बाप ने बच्चे का नाम रखा ही होगा। यह तो भौतिकवाद की बात रही। बिना नाम दान लिए जीव का कल्याण नहीं होता। भगवान् ने सृष्टि के प्रथम काल में यही बताया। जब सृष्टि की समप्ति हो गई, प्रल्य हो गया और प्रलय के बाद – पुन: रेव; दोबारा से सृष्टि का प्रादुर्भाव करने का संकल्प लिया तो देवी रूदन करने लग गई। रूदन करके कहने लगी कि प्रभु! आप तो पहले वाली सृष्टि बना रहे हो, मैं तो इसी लिए रो रही हूं। मुझे तो रोना ही पड़ेगा। उसी समय नाम दान का विधान किया गया। भगवान ने कहा कि 5 प्रकार के संस्कार करके अर्थात्त प्रथम यज्ञादि करके, प्रायश्चित यज्ञ करके यज्ञोपवीत धारण करा करके, और उनके लिए तिलक आदि धारण करके, शंख चक्र से मुद्रांकित करके, मन्त्र का उपदेश – अष्टाक्षर का उपदेश करके अर्थ समझाये। उस मन्त्र के जाप करने से वह जीव कभी नरक में नहीं जाता, किसी महान संकट कलेशों में नहीं आता, किसी प्रकार के उपद्रव व व्याधि उसको नहीं होती। अगर पूर्व संस्कार की वजह से होती हैं तो थोड़ी बहुत हो कर बन्द हो जाती हैं। इसलिए नाम दान लेना बहुत जरूरी हैं।

नाम दान माईक पर नहीं दिया जाता। माईक पर तो गीत गाया जाता है, माईक पर तो मैंने सत्संग सुना दिया।

नाम दान का प्रमाण बाबा नानक देवजी दे रहे हैं। गुरू ग्रन्थ साहिब की मूल प्रति पृष्ट 1362 पर पढ़िये। बाबा लिख रहे हैं –

जगदीश्वर घट घट पूर रहे मेरे जीवन प्राण।
भव बन्धन मेरे कटे जब मन्त्र दियो गुरू कान।।

नाम दान तो कान में ही होता है। अनहद नाद तभी जाग्रत होता है जब मन्त्र कान में दिया जाये। माईक पर तो कथा है। यह नाम दान नहीं। नामदान तो पंच संस्कार विधि द्वारा कान में दिया जाए, उसी का नाम नामदान है। नाम तो नाम है पर दान क्या है? वह ऋषि, वह मुनि, वह गुरू यह संकल्प लेता है कि मैंने जीवनकाल में जो तप किया है उसका कुछ भाग इसको दे दिया जाये! तो नाम के साथ तपस्या का दान दिया जाता है।

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