Swami Sri Purshottamacharya Ji Maharaj
Edit this entry‘‘आत्मा वै जायते पुत्रः’’ पुत्र एवं शिष्य के रुप में आत्मा ही आविर्भूत होता है । पुत्र में अथवा शिष्य में गुरु का ही साक्षात् दर्शन अक्षिलक्ष्य होता है । इन्द्रप्रस्थ एवं हरियाणापीठाधीश्वर अनन्तश्रीविभूषित श्रीमज्जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी के उत्तराधिकारी आचार्य श्री पुरुषोत्तमाचार्य जी महाराज के दर्शन करने पर परमश्रद्धेय गुरुमहाराज जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी श्री सुदर्शनाचार्य जी महाराज ही साक्षात् समुपस्थित दृष्टिगत होते है ।
अनेक जन्मों की साधना से संसिद्ध पुरुष ही श्रीमन्तों, देशिकों, योगियों के कुल में जन्म ग्रहण करता है । आचार्यपाद श्री पुरुषोत्तम जी महाराज ने गुरुमहाराज के यहाँ जन्म लेकर सिद्ध कर दिया कि आप अनेक पूर्वजन्मों की साधना के फलस्वरुप गुरुमाता के गर्भ से इस भूलोक में अवतरित हुए हैं । शैशवावस्था में ही आपका अद्भुत शेमुषी कौशल, प्रबल मेधा शक्ति नवनवोन्मेषवती प्रतिभा से परिजन आप में विलक्षणता के दर्शन कर आह्लादित होते थे । छात्रावस्था में कठिनतम विषयों को सहजरुप में ग्रहण करने की आपकी विलक्षण मेधा से गुरुजन अत्यन्त प्रभावित होते थे । गुरुओं को ऐसा प्रतीत होता था मानों विज्ञान जैसा कठिन विषय भी आपका पूर्व पठित हो । प्रत्येक कक्षा में श्रेष्ठतम श्रेणी से सफलता प्राप्त कर आपने एक कीर्तिमान स्थापित किया । गुरु महाराज के ज्येष्ठ पुत्र उत्तराधिकारी एवं शिष्य होने से अध्यात्मज्ञान एवं लोककल्याण के कार्यों में आपकी स्वाभाविक प्रवृर्त्ति रही । संपूर्ण आश्रमों की पालना करने से गृहस्थाश्रम सभी आश्रमों में मूर्धन्य स्थान पर अवस्थित है । पितृऋण की मुक्ति के लिए आपने गृहस्थाश्रम में प्रवेश किया तथा भलीभाँति गृहस्थ धर्म का पालन किया ।
जैसा कि पूर्व में निर्दिष्ट किया गया है आप शैशवावस्था से ही धार्मिक क्रियाकलापों में सोत्साह भाग लेते थे । धार्मिक अनुष्ठानों में आपकी गहरी रुचि रहती थी । गुरुमहाराज ने जब (फरीदाबाद) अरावली पर्वत की उपत्यका में सिद्धदाता आश्रम की स्थापना का निश्चय किया, उस समय सन् 1989 में इस पर्वतीय निर्जन प्रदेश में आश्रम स्थापना हेतु संचालित गतिविधियों में आप सदैव सोत्साह भाग लेते थे । पूज्य गुरुमहाराज तो त्रिकालदर्शी, भूत भविष्यत् वर्तमान के साक्षात् द्रष्टा रहे हैं अतः स्वल्पायु में ही आप में विधमान विलक्षण आध्यात्मिक संस्कारों को देखकर श्री गुरु महाराज ने मंत्र दीक्षा के पश्चात् आपको पुरुषोत्तमाचार्य नाम से अभिहित किया तथा बालक श्री पुरुषोत्तमाचार्य जी को वृहत कार्यों का उत्तरदायित्व देना प्रारम्भ कर दिया था । आपको जो भी उत्तरदायित्व दिया जाता उसे तो आप सहज रुप से पूर्ण करते ही थे, परन्तु ‘‘अनुक्तमप्यूहति पण्डितो जनः’’ इस उक्ति को चरितार्थ करते हुए गुरुमहाराज के मनोऽभिलषितों को कथन से पूर्व ही पूर्ण कर अपनी योग्यता से सभी को प्रभावित करते थे ।
भविष्यद्रष्टा परमपूज्य श्रीगुरुमहाराज ने सिद्धदाता आश्रम का भूमि पूजन आपके करकमलों द्वारा ही संपन्न कराया । आपका सौम्य-स्वभाव, मृदुभाषिता, स्नेहपूर्ण व्यवहार, सबके साथ आत्मीयता का भाव आदि श्रेष्ठ गुणों को देखकर आपको जनहित चेरिटेबल ट्रस्ट के प्रधान पद का उत्तरदायित्व दिया गया तथा सिद्धदाता सत्संग सेवा समिति के अध्यक्ष पद पर आपको मनोनीत किया गया । विलक्षण शक्तिपुंज श्री पुरुषोत्तमाचार्य जी अहर्निश कार्य करते रहते हैं, परन्तु कभी भी थकान का अनुभव नहीं करते हैं ।
आपके मन में सदैव एक ही प्रबल अभिलाषा रही है कि गुरुमहाराज के मनः संकल्पित स्वप्नों को शीध्र ही पूर्ण किया जावे । श्री सिद्धदाता आश्रम व श्री लक्ष्मीनारायण दिव्य धाम का जो भव्य स्वरुप आज हमारे सामने मूर्तरुप में प्रतिष्ठित है, उस सबका श्रेय गुरुमहाराज के स्वप्नों को शीघ्र क्रियान्वयन में आप द्वारा किया गया अथक परिश्रम ही एकमात्र हेतु है ।
गुरु महाराज की अस्वस्थावस्था में 19 से 23 अप्रैल, 2007 में श्री सिद्धदाता आश्रम में लक्ष्मीनारायण दिव्य धाम में विभिन्न देव मूर्तियों के प्राणप्रतिष्ठा समारोह की संपूर्ण व्यवस्था आपने अत्यन्त दक्षता से संपन्न की । देश-विदेश से समागत आचार्यगण, विद्वज्जन, संत, महन्त, पीठाधीश्वर, राजनेता, मंत्रीगण, अधिकारीगण, शिष्य वर्ग, भक्तजन आदि की यथायोग्य विश्राम, आवास, भोजन, यातायात की सुव्यवस्था की तथा विशाल संख्या में प्राणप्रतिष्ठा समारोह को देखने हेतु समुपस्थित जन समुदाय के विश्राम, आवास, उपवेशन, प्रसाद आदि की व्यवस्था करना साथ-साथ प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव में स्वयम् उपस्थित रहना गुरुमहाराज को व्यक्तिशः संभालना प्रत्येक सेवा कार्य को देखना सेवादारों को मार्गदर्शन करना आदि सभी कार्यों को ‘‘एकोऽहं बहु स्याम्’’ के रुप में संभालने की विलक्षण योग्यता देखकर सबको महान् आश्चर्य होता था । ऐसा प्रतीत होता था मानों कोई महापुरुष अपने अद्भुत प्रभाव से संपूर्ण कार्यों को एक स्थान से ही संचालित कर रहा है ।
मूर्धन्य वैदिक विद्वानों ने शास्त्र समंत विधिविधान से देश विदेश से पधारे हुए विद्वानों, संतों, मंहन्तों एवं भगवद्भक्तों की उपस्थिति में प्राण प्रतिष्ठा का कार्य सम्पादित किया । आचार्य श्री पुरुषोत्तम जी की विलक्षण सूझबूझ का ही फल था कि श्रीरामानुज संप्रदाय के मूर्धन्य विद्वानों को आमंत्रित कर संप्रदाय परम्परानुसार देव विग्रहों की प्राण प्रतिष्ठा अत्यंत समुल्लास के साथ निष्पन्न हुई । उत्तर भारत में रामानुज संप्रदाय के सर्वाधिक प्रतिष्ठित आचार्य बङा खटला वृन्दावन के पीठाधीश्वर महन्त स्वामी श्री जयकृष्णाचार्य जी महाराज की अध्यक्षता में समारोह प्रारंभ हुआ । समारोह में त्रिदण्डी जियर स्वामी लक्ष्मीप्रपन्नाचार्य जी, देवरियापीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी राजनारायणाचार्यजी, जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी श्री श्यामनारायणजी (अयोध्या), स्वामी कानाचार्य जी (उज्जैन), परमार्थपीठाधिपति स्वामी श्री पुरुषोत्तमाचार्य जी (जगन्नाथपुरी, उङीसा), त्रिदण्डी जियरस्वामी श्री सुदर्शनाचार्य जी, अशर्फी भवन अयोध्या के पीठाधिपति जगद्गुरु स्वामी श्रीधराचार्य जी प्रभृति सन्त महन्त उपस्थित थे ।
गुरु महाराज ने यथासमय आपको अपना उत्तराधिकारी धोषित कर दिया था । जैसा कि उल्लेख किया है कि ‘‘आत्मा वै जायते पुत्रः शिष्यश्च’’ अतः आप में वे सभी गुण पूर्ण रुप से विधमान हैं । समारोह के अवसर पर संतों, महन्तों, त्रिदण्डी स्वामियों, पीठाधीश्वरों की उपस्थिति में नव प्रतिष्ठित श्री लक्ष्मीनारायण भगवान् के सम्मुख श्री चिन्ना जियर स्वामी एवं बङा खटला वृन्दावन के पीठाधिपति महन्त स्वामी श्री जयकृष्णाचार्य जी ने आपको महाराज श्री के उत्तराधिकारी पद पर अभिषिक्त किया । आपने उत्तराधिकार-घोषणा के साथ ही स्पष्ट रुप से कहा कि गुरु महाराज से प्राप्त प्रेरणा के बाद अब मेरा संपूर्ण जीवन विश्व शांति और मानव कल्याण के लिए समर्पित है । मैं गुरु महाराज द्वारा प्रदर्शित मार्गों का अनुसरण करते हुए उनके कार्यों को पूर्ण करने का पूर्ण प्रयास करुंगा ।
बाल्यकाल में जिसे प्रह्लाद नाम से जाना जाता था । ऐसे परम पूज्य गुरुमहाराज के संपूर्ण गुण आप में यथावत् प्रतिबिंबित होते हैं । गुरुमहाराज जन साधारण के सुख दुःखों को स्वयम् अनुभव कर उसे निवारित करने में संलग्न रहते हैं । आप स्वयं तपोमार्ग से प्रवृत्त हैं । गुरु शिष्य में शक्तिपात करता है । अतः पूज्य गुरुमहाराज ने वे संपूर्ण शक्तियाँ आपको प्रदान की हैं जो उनमें विधमान थी एवं देश-विदेश में अवस्थित लाखों भगवद् भक्तों से आप सीधे संपर्क में रहते हैं और उनकी विभिन्न समस्याओं का समाधान करते हैं । आपका अध्यात्मज्ञान अत्यन्त विलक्षण है । आपकी आध्यात्मिक रचनाओं का अध्ययन कर भक्त जन निरन्तर परमात्मचिंतन में प्रवृत्त होने का प्रयत्न करते हैं । उन्हें पढ़कर अलौकिक आनन्दानुभव करते हैं । वस्तुतः आपके दर्शन के साथ ही गुरुमहाराज के ही दर्शन होते हैं । साक्षात् गुरुमहाराज ही आपके रुप में प्रतिबिंबित हैं ।


